अरविन्द केजरीवाल जवाब दो


2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव....
शीला दीक्षित जी ( कांग्रेस ) के लगातार 15 वर्षो के शासन के दौरान हुए घोटालों से जनता त्रस्त....
चारों ओर से दिल्ली और केंद्र की यूपीए सरकार के भृष्टाचार के खिलाफ आवाज़ ने आंदोलन का रूप ले लिया....
आंदोलन के अग्रणी लोगों में से अन्ना हजारे और साथ में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, गोपाल रॉय, कुमार विश्वास, आदि.....
आंदोलन की उग्रता को देखते हुए कांग्रेस को पूरा विश्वास हो चुका था कि दिल्ली में अब फिर से सत्ता हाथ नहीं आने वाली क्योंकि इस आंदोलन का मुख्य निशाना थी शीला दीक्षित और उस की 400 पेज़ की वो फाईल.....
खैर चुनाव आये और दिल्ली में एक नये राजनितिक दल का सूत्रपात हुआ...
" आम आदमी पार्टी "
राजनीती में नहीं उतरने की कसमें खाने वाले अन्ना आंदोलन के अधिकांश लोग इस में शामिल हो गये....
चुनाव हुए और परिणाम आश्चर्यजनक.....
15 साल से सत्ता में रही काँग्रेस मात्र 8 सीट पर सिमट गयी। 32 सीट के साथ भाजपा सन्तोष कर रह गयी लेकिन नई नवेली आम आदमी पार्टी ने 28 सीट पर कब्ज़ा जमा कर तहलका मचा दिया।
70 विधानसभा सीट वाली दिल्ली में किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और इसी के साथ काँग्रेस को कूटनीति खेल खेलने का मौका मिल गया।
काँग्रेस के खिलाफ लड़ने और अपने बच्चों तक की कसमे खाने वाले अरविन्द केजरीवाल उसी काँग्रेस की बैसाखी लिए 28 दिसम्बर 2013 को दिल्ली के सिंहासन पर खड़े हो गये।
अब ज़ाहिर सी बात कि जिस की बैसाखी लिए खड़े हों तो उस के खिलाफ कैसे बोल पाते।
खैर 49 दिन के बाद 14 फ़रवरी 2014 को आखिर भानुमति का कुनबा बिखर गया और दिल्ली को राष्ट्रपति शासन से रूबरू होना पड़ा।
इसी दौरान लोकसभा चुनाव हुए और केजरीवाल की आप को 4 सीट ही मिली और 10 साल से काबिज़ यूपीए की मुख्य घटक दल काँग्रेस को मात्र 44 सीट ही मिली तो वहीँ NDA को नरेंद्र मोदी जी के मार्ग दर्शन में 336 सीट जिसमें अकेले भाजपा को पूर्ण बहुमत 282 सीट मिली, जो ऐतिहासिक रहा।
इस चुनाव में वाराणसी संसदीय क्षेत्र से नरेंद्र मोदी जी ने अरविन्द केजरीवाल जी को 3 लाख 71 हजार वोट से हराया और दिल्ली में सभी 7 लोकसभा सीट भाजपा के खाते में गयी।
शायद यही वजह रही कि केजरीवाल जी और कांग्रेस दोनों को लगा कि अगर सत्ता में बने रहना है तो मिलकर खेल खेलना होगा।
खैर दिल्ली में एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद दोबारा चुनाव हुए और परिणाम ने सारे राजनितिक गलियारों में तहलका मचा दिया।
अब की बार काँग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली तो भाजपा को मात्र 3 सीट ही मिली। 67 सीट पर अकेले केजरीवाल की पार्टी ने कब्ज़ा किया।
यहाँ गौर करने वाली बात है कि भाजपा को मिले वोट प्रतिशत में कोई खास फर्क नहीं आया लेकिन काँग्रेस का एक खास वोट बैंक आप की तरफ झुक गया या झुका दिया गया।
काँग्रेस ने अपने कभी ना हारने वाले दिग्गजों की जमानतें तक जब्त करवा ली, सिर्फ भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए।
अब केजरीवाल साहब शान से 14 फ़रवरी 2015 को फिर से दिल्ली की गद्दी पर बैठ गये।
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असली काम तो अब होना चाहिए था, ना किसी की बैसाखी थी और ना कोई दबाव....
शायद कोई कूटनीति सौदेबाज़ी अवश्य हुई इस प्रचंड बहुमत के पीछे कि...
अब केजरीवाल साहब की राजनीती का हैंडल सिर्फ और सिर्फ भाजपा के विरोध में मुड़ गया।
भाजपा शासित राज्यो में ही साहब की राजनीती केंद्रित हो गयी।
छोटे से मारपीट के मुद्दे पर हो हल्ला लेकिन बिहार के चन्दा बाबू का दर्द नहीं दिखा, जिस के तीन तीन बेटों की हत्या कर जीवन बगिया ही सूनी कर डाली गयी।
जिसे खुद अपनी दिल्ली में रोज हो रहे हत्या बलात्कार नहीं दिखते, दिन दहाड़े सरे राह एक लड़की को चाकुओं से गोद दिया जाता है लेकिन साहब चुप.......
साहब को यूपी के उस परिवार का दर्द नहीं दिखा जिसे ना केवल लूटा गया बल्कि पुरुषो को बंधक बना कर औरतों से बलात्कार किया गया।
केजरीवाल साहब सत्ता की इतनी ही भूख है तो बिहार, बंगाल का चुनाव क्यों नहीं लड़े ?
बिहार बंगाल यूपी में तो क्या दलित क्या आम आदमी...सब की हालत भाजपा शासित राज्यों से कहीं बदत्तर हैं। वहां जा कर जनसेवा क्यूँ नहीं करते साहब ?
यूपी में चुनाव लडो साहब.....
वहाँ तो वहीँ आप की शीला जी काँग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री की घोषित उम्मीदवार भी हैं, जिसे आपने दिल्ली में धूल चटाई थी।
लेकिन मैं जानता हूँ "आप" ऐसा नहीं करेंगे।
शीला दीक्षित तो एक मिलाजुला बहाना था राजनीती में आने का भी और भाजपा को बाहर रखने का।
अब ना लोकपाल का अता पता और शीला दीक्षित जी की 400 पन्नों की फाईल ना जाने किस सुनामी में बह गयी।
जब फाईल ही नहीं रही तो विरोध कैसा ?
#देबू_काका

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